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श्री चैतन्य भागवत
»
खण्ड 2: मध्य-खण्ड
»
अध्याय 17: नवद्वीप में भगवान का भ्रमण और भक्तों की महिमा का वर्णन
»
श्लोक 80
श्लोक
2.17.80
লজ্জায অদ্বৈত কিছু না বলে বচন
প্রেম-যোগে মনে চিন্তে প্রভুর চরণ
लज्जाय अद्वैत किछु ना बले वचन
प्रेम-योगे मने चिन्ते प्रभुर चरण
अनुवाद
अद्वैत को कुछ भी कहने में शर्म आ रही थी। प्रेमोन्मत्त होकर उसने भगवान के चरणकमलों का ध्यान किया।
Advaita was too embarrassed to say anything. In a trance, he meditated on the Lord's lotus feet.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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