श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  2.16.95 
হেন ভক্ত অদ্বৈতেরে বলিতে হরিষে
পাপি-সব দুঃখ পায নিজ কর্ম-দোষে
हेन भक्त अद्वैतेरे बलिते हरिषे
पापि-सब दुःख पाय निज कर्म-दोषे
 
 
अनुवाद
जब अद्वैत प्रभु जैसे भक्त की आनन्दपूर्वक महिमा की जाती है, तो पापी व्यक्ति अपने पिछले दुष्कर्मों के कारण दुःखी हो जाते हैं।
 
When a devotee like Advaita Prabhu is joyfully glorified, sinful persons become sad because of their past misdeeds.
तात्पर्य
श्री अद्वैत आचार्य, श्री गौरासुंदर के परम भक्त हैं। ये दुष्ट, कुभाग्यशाली, पापी लोग जो अद्वैत प्रभु को भगवान चैतन्य के अनन्य भक्त घोषित करने के बजाय भगवान चैतन्यदेव को श्री अद्वैत का सेवक मानते हैं, वे अपने पुराने कर्मों के कारण असीमित विपत्तियों में डूब जाते हैं। परंतु महाप्रभु के शुद्ध भक्त अद्वैत प्रभु को महाप्रभु का सेवक मानते हुए अत्यधिक आनंदित होते हैं। वे पापमय लोग जो प्रभु के प्रत्यक्ष लीलाओं के दौरान घटी इन सबसे तथ्यात्मक घटनाओं पर विश्वास नहीं करते हैं और अद्वैत की कल्पना "चैतन्य की सेवा के रूप में" करके अपने स्वयं के अशुभता को आमंत्रित करते हैं, वे बर्बाद हो जाते हैं। श्री अद्वैत प्रभु के कुछ पुत्रों और उनके वंशजों ने अद्वैत प्रभु को श्री चैतन्यदेव का अनन्य सेवक स्वीकार नहीं किया और अद्वैत को "निर्विशेषवादी" घोषित करने में गर्व महसूस किया। परिणामस्वरूप वे पूरी तरह से बर्बाद हो गये।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)