श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  2.16.6 
লুকাইলে কি হয, অন্তরে ভাগ্য নাই
অল্প ভাগ্যে সেই নৃত্য দেখিতে না পাই
लुकाइले कि हय, अन्तरे भाग्य नाइ
अल्प भाग्ये सेइ नृत्य देखिते ना पाइ
 
 
अनुवाद
छिपने से क्या फायदा? उसके पास पर्याप्त सौभाग्य नहीं था, और पर्याप्त सौभाग्य के बिना कोई भी भगवान का नृत्य नहीं देख सकता।
 
What good was hiding? He didn't have enough good fortune, and without enough good fortune one cannot see the Lord dance.
तात्पर्य
हर कोई भाग्यशाली नहीं होता है कि वह श्री गौरसुंदर के उन्मादपूर्ण नृत्य को देख सके। यदि समझ में कम लोग भी ऐसा नृत्य देखें, तो वे इसके उद्देश्य को समझने में असमर्थ होते हैं। यद्यपि कोई भाग्यशाली हो सकता है और प्रभु के नृत्य को प्रत्यक्ष देख सकता है, यदि वह अपने हृदय में प्रभु के प्रति घृणा रखता है, तो उसका मन भटक जाएगा। जब मन और वाणी के बीच असंगति होती है, तो इसे "धोखा" कहा जाता है। दरअसल, धोखा देना और अनुसरण करना एक ही चीज नहीं है। इस दुनिया में यह देखा जाता है कि अवैयक्तिकतावादी लोग गरीबों के अवशेषों को स्वीकार करने का दिखावा करके नाम और प्रसिद्धि अर्जित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन भले ही वे अपने सांसारिकता और ज्ञान के गर्व को ढंकने की कोशिश करते हैं, वे वास्तव में "विनम्रता" के प्रतिष्ठित मंच को प्राप्त नहीं करते हैं। अवैयक्तिकतावाद के दर्शन में लिप्त रहते हुए आत्म-प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए उनके द्वारा प्रदर्शित समानता के मंच को कभी भी "स्वामित्व से रहित विनम्रता" के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)