श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  2.16.59 
“শুন বাপ, চোরে যদি সাক্ষাতে না পায
তবে তার অগোচরে লৈতে যুযায
“शुन बाप, चोरे यदि साक्षाते ना पाय
तबे तार अगोचरे लैते युयाय
 
 
अनुवाद
"सुनो मेरे प्यारे प्रभु। अगर चोर कोई चीज़ खुलेआम न ले सके, तो उसे चुपके से ले लेना चाहिए।"
 
"Listen, my dear lord. If a thief cannot take something openly, he must take it secretly."
तात्पर्य
यदि किसी से खुलेआम कुछ चुराना संभव न हो, तो एक चोर उस वस्तु को छिप कर चुराने में सक्षम होता है। पर यदि यह ज्ञात हो जाए कि ऐसे कृत्य से किसी को नुकसान पहुँचाने का अपराध दोबारा नहीं दोहराया जाएगा, तो उस ज्ञान से सुख मिलता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)