श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  2.16.48 
এহো কর্ম অদ্বৈত করিতে পারে মাত্র
প্রভু করিযাছে যারে মহা-মহা-পাত্র
एहो कर्म अद्वैत करिते पारे मात्र
प्रभु करियाछे यारे महा-महा-पात्र
 
 
अनुवाद
ऐसी गतिविधियाँ केवल अद्वैत के लिए ही संभव थीं, क्योंकि भगवान ने उन्हें दया का महान पात्र बनाया था।
 
Such activities were possible only for Advaita, because God had made him a great vessel of mercy.
तात्पर्य
श्री गौरा के चरण-कमलों में श्री अद्वैत प्रभु की प्रेम-भक्ति देखकर भक्त-वृंद ने उन्हें अहंकार रहित तथा समस्त इन्द्रियों को वश में करने वाले श्रेष्ठ तत्वज्ञ माना। संसार के भक्त समुदाय से उनकी श्रेष्ठता का प्रचार करने के लिए सबने उनको अद्वैत, अर्थात् जिसका कोई दूसरा न हो, के रूप में स्थापना की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)