श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.16.45 
ভাবাবেশে প্রভু যে সমযে মূর্চ্ছা পায
তখনে অদ্বৈত চরণের পাছে যায
भावावेशे प्रभु ये समये मूर्च्छा पाय
तखने अद्वैत चरणेर पाछे याय
 
 
अनुवाद
जब भी भगवान परमानंद में अचेत हो जाते, अद्वैत उनके चरणों के पास आ जाता।
 
Whenever the Lord became unconscious in ecstasy, Advaita would come to his feet.
तात्पर्य
महाप्रभु, अद्वैत प्रभु का आदर करते थे। अत: क्योंकि श्री अद्वैत प्रभु को श्री महाप्रभु के कमलों को खुले तौर पर छूने का मौका नहीं मिलता था, इसलिए वे अवसर का लाभ उठाकर चोरी-छिपे प्रभु के कमलों को छू लेते थे, जब प्रभु परमानंद में लीन रहते थे। जब महाप्रभु अचेत रहते थे तो, अद्वैत उनके कमलों पर गिरते थे और विलाप में आंसू बहाते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)