श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.16.43 
যে চরণ মনে চিন্তে, সে হৈল সাক্ষাতে
অদ্বৈতের ইচ্ছাথাকি সদাই তাহাতে
ये चरण मने चिन्ते, से हैल साक्षाते
अद्वैतेर इच्छाथाकि सदाइ ताहाते
 
 
अनुवाद
जिन चरण कमलों का अद्वैत निरंतर ध्यान करता था, वे अब प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित थे, और अद्वैत की इच्छा सदैव उनमें लीन रहने की थी।
 
The lotus feet on which Advaita constantly meditated were now tangibly present, and Advaita desired to remain absorbed in them forever.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)