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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना
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श्लोक 33
श्लोक
2.16.33
খণ্ডিলে ঈশ্বর-ভাব সবাকার স্থানে
অসর্বজ্ঞ-হেন প্রভু জিজ্ঞাসে আপনে
खण्डिले ईश्वर-भाव सबाकार स्थाने
असर्वज्ञ-हेन प्रभु जिज्ञासे आपने
अनुवाद
जब परमपिता परमेश्वर के रूप में उनका मन विचलित होता तो वे सभी से ऐसे बात करते जैसे कि उन्हें सब कुछ पता ही न हो।
When His mind was disturbed as the Almighty God, He would speak to everyone as if He did not know everything.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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