श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  2.16.32 
এমন ক্রন্দন করে, পাশাণ বিদরে
নিরন্তর দাস্য-ভাবে প্রভু কেলি করে
एमन क्रन्दन करे, पाशाण विदरे
निरन्तर दास्य-भावे प्रभु केलि करे
 
 
अनुवाद
वह ऐसे रोते थे कि पत्थर भी पिघल जाता था। प्रभु निरंतर सेवक भाव से अपनी लीलाओं का आनंद लेते थे।
 
He wept so loudly that even a stone would melt. The Lord constantly enjoyed His pastimes with a spirit of service.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)