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श्री चैतन्य भागवत
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खण्ड 2: मध्य-खण्ड
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अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना
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श्लोक 26
श्लोक
2.16.26
স্বভাবে চৈতন্য-ভক্ত আচার্য গোসাঞি
চৈতন্যের দাস্য-বৈ আর ভাব নাই
स्वभावे चैतन्य-भक्त आचार्य गोसाञि
चैतन्येर दास्य-बै आर भाव नाइ
अनुवाद
अद्वैत आचार्य स्वाभाविक रूप से भगवान चैतन्य के भक्त थे। भगवान चैतन्य की सेवा के अलावा उनकी कोई अन्य इच्छा नहीं थी।
Advaita Acharya was a natural devotee of Lord Chaitanya. He had no other desire than serving Lord Chaitanya.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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