श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.16.150 
ঽঅকিঞ্চন-প্রাণ কৃষ্ণঽ—সর্ব বেদে গায
সাক্ষাতে গৌরাঙ্গ এই তাহারে দেখায
ऽअकिञ्चन-प्राण कृष्णऽ—सर्व वेदे गाय
साक्षाते गौराङ्ग एइ ताहारे देखाय
 
 
अनुवाद
सभी वेद गाते हैं, "कृष्ण उन लोगों के जीवन और आत्मा हैं जिनके पास कोई भौतिक संपत्ति नहीं है।" गौरांग ने स्वयं इसका प्रदर्शन किया।
 
All the Vedas sing, "Krishna is the life and soul of those who have no material possessions." Gauranga himself demonstrated this.
तात्पर्य
कृष्ण उन सभी अकिंचनों की आत्मा और जीवन हैं, जिनका इस दुनिया की किसी भी वस्तु से कोई मोह नहीं होता है। यह तथ्य सभी वेदों और वेदों के अनुसरण में लिखे गए साहित्यों में गाया जाता है। गौरसुंदर उस गोपनीय वैदिक सत्य के आचार्य और उपदेशक थे। अपने भक्त सेवकों के माध्यम से भगवान ने भौतिक अवधारणाओं को तुच्छ और वेदों के सार को अमूर्त रूप देने में विशेषज्ञता का पता लगाया। जो लोग शुक्लमंबर और गौरसुंदर के मनोरंजन के विषयों को सुनते हैं, उन्होंने अपने आध्यात्मिक कानों को छेदने के संस्कार से गुजरना पड़ा है, और चैतन्यदेव के चरणों में प्रेममय सेवा करते हुए, वे मंदिर में भिखारियों के रूप में "गौड़ीयों" के रूप में जाने जाते हैं। भक्ति सेवा की। लेकिन गौड़ियों के रूप में अपनी पहचान बनाते हुए वे भगवान चैतन्य के चरण कमलों की सेवा से दूर रहकर आत्महत्या करने की कोशिश नहीं करते हैं और इस तरह गोविंद की सेवा से विमुख हो जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)