श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 148
 
 
श्लोक  2.16.148 
দেখিঽ মূর্খ দরিদ্র যে বৈষ্ণবেরে হাসে
তার পূজা-বিত্ত কভু কৃষ্ণেরে না বাসে
देखिऽ मूर्ख दरिद्र ये वैष्णवेरे हासे
तार पूजा-वित्त कभु कृष्णेरे ना वासे
 
 
अनुवाद
कृष्ण कभी भी ऐसे व्यक्ति का प्रसाद और पूजा स्वीकार नहीं करते जो किसी वैष्णव का उपहास करता है, उसे मूर्ख या दरिद्र समझता है।
 
Krishna never accepts the offerings and worship of a person who ridicules a Vaishnava, considers him foolish or poor.
तात्पर्य
श्री गौरसुन्दर द्वारा रागानुगा (सहज प्रेम) के सबसे ऊँचे मंच को नियमित भक्ति भावना का अंतिम लक्ष्य के रूप में स्थापित करने से यह समझ में आता है कि अनुराग की महिमा और मिठास आराधना के मार्ग की सभी व्यवस्थाओं की समझ से परे है। जो लोग खुद को कामुक प्राप्त ज्ञान में बहुत अधिक उन्नत समझते हैं, वैष्णवों का भौतिकवादी दृष्टिकोण से विश्लेषण करके अपने ही विनाश को आमंत्रित करते हैं। हालांकि भौतिक भोग के अभिमान से अंधे ऐसे लोग कई बच्चे पैदा कर सकते हैं, बहुत संपन्न बन सकते हैं, और प्रतिष्ठित परिवारों में जन्म ले सकते हैं, वे यह नहीं समझ सकते कि केवल एक वैष्णव ही गुरु बन सकता है। आचार्यों के परिवारों में पाई जाने वाली कृत्रिम पूजा और दीक्षा देने की परंपराएँ अभिमान के कारण केवल अंधापन हैं। यही कारण है कि गोस्वामी जाति के दर्शन में पाई जाने वाली अवधारणाएँ वैष्णव को परिभाषित करने में असमर्थ हैं। वेदों के लंबे अध्ययन के बाद, विद्वान विद्वान वैष्णवों को जो पहले से ही वैदिक अध्ययन का फल प्राप्त कर चुके हैं, अज्ञानी मूर्ख, गरीबी से त्रस्त और उपहास के योग्य मानते हैं, लेकिन कृष्ण ऐसे अभिमानी व्यक्तियों से कभी पूजा या पूजा की सामग्री स्वीकार नहीं करते। एक गरीब वैष्णव का सब कुछ अर्पित करना इस बात का प्रमाण है कि वह कृष्ण से संबंधित नहीं वस्तुओं के लालच से मुक्त है, इसलिए जब तक कोई व्यक्ति अलौकिक वैष्णव नहीं बन जाता, वह कृष्ण को संतुष्ट नहीं कर सकता। इस संबंध में श्रीमद भागवतम के दो छंदों पर चर्चा की जानी चाहिए जो येषाम स एष भगवान और यस्याहम अनुगृह्नामि से शुरू होते हैं [येषाम स एष भगवान दययेद अनंतः, सर्वत्मनाश्रित-पदो यदि निर्व्यलीकम, ते दुस्तरम् अतितरंति च देव-मायां नैषां मामहम इति धीः श्व-शृगाल-भक्ष्ये, "लेकिन जो कोई भी सर्वोच्च भगवान, भगवद व्यक्तित्व द्वारा विशेष रूप से लाभान्वित है, भगवान की सेवा के लिए अलौकिक समर्पण के कारण, भ्रम के दुर्गम सागर को पार कर सकता है और भगवान को समझ सकता है। लेकिन जो इस शरीर से जुड़े हुए हैं, जिसे अंत में कुत्तों और गीदड़ों द्वारा खाया जाना है, वे ऐसा नहीं कर सकते।" (भाग. 2.7.42) यस्याहम अनुगृह्नामि हरिष्ये तद-धनंशनैः ततो धनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दुःख- दुःखितम "अगर मैं किसी पर विशेष रूप से एहसान करता हूं, तो मैं धीरे-धीरे उसे उसके धन से वंचित करता हूं। फिर ऐसे गरीब आदमी के सगे-संबंधी और दोस्त उसे छोड़ देते हैं। इस तरह उसे एक के बाद एक दुख होता है।" (भाग. 10.88.8)]। वैष्णव हमेशा भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने की अवधारणाओं को स्वप्न की स्थिति में पाई जाने वाली अवधारणाओं के समान महत्वहीन मानते हैं और नाशवान वस्तुओं की प्राप्ति को इस भौतिक संसार में जागने की स्थिति के समान महत्वहीन मानते हैं। इसलिए वे भौतिक भोगियों से हमेशा दूर स्थित रहते हैं, जो प्रकृत-सहजिया से मिलते जुलते हैं। लेकिन पुंडरीक विद्यानिधि और राया रामानांद जैसे सर्वोपरि भक्तों की संपन्नता देखकर, भौतिकवादियों का भक्तों की कामुक गतिविधियों में भौतिक प्रवृत्तियों का अवलोकन उनके घबराहट को बढ़ा देता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे इंद्रिय भोग के नशे से अंधे हो गए हैं। "कृष्ण ही एकमात्र भोग की वस्तु है, उसके अलावा कोई भोग की वस्तु नहीं है" यह दृढ़ विश्वास विष्णु के भक्तों के लिए सबसे अधिक वांछनीय है। इस तरह के लालच के प्रभाव में, जो लोग कृष्ण के रूप, गुणों, सहयोगियों, विशेषताओं और लीलाओं के प्रति उत्साही हैं, सैकड़ों पिछले जन्मों में वासुदेव की पूजा करने के कारण शुभ प्राप्त करते हैं; और पवित्र नामों का आश्रय लेने के बाद, उन्हें अनुराग के मार्ग पर अपनी अनुकरणीय पूजा प्रक्रिया प्रदर्शित करने का अवसर प्राप्त होता है। श्री हरि केवल अपने भक्तों द्वारा नियंत्रित होते हैं और अविश्वासियों की पूजा को भी स्वीकार नहीं करते हैं, यह श्रीमद भागवतम (4.31.21) में इस प्रकार वर्णित है:
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)