स्मर्तव्यः सततं विष्णुर् विस्मर्तव्यो न जातुचित
सर्वे विधि-निषेधाः स्युर एतयोरेव किङ्कराः
''कृष्ण प्रभु विष्णु के जनक हैं। उन्हें निरंतर स्मरण करना चाहिए और कभी भी नहीं भूलना चाहिए। शास्त्रों में उल्लिखित सभी नियम और निषेध इन दो सिद्धांतों के ही सेवक हैं।''
श्री गौरसुंदर का शुक्लांबर के प्रेमपूर्वक चावल स्वीकार करने का कालक्रम, बिना यह विचार किए कि चावल उबला हुआ था या कच्चा और उचित भेंट के नियमों की अवहेलना करते हुए, उनके लिए परम लक्ष्य है जो अर्चना के मार्ग पर हैं और पंचरात्रों पर आधारित विनियमित भक्तिमार्ग का अनुसरण करते हैं। सभी वैदिक नियम और विनियम केवल भक्ति सेवा के अनुकूल प्रयास हैं, इसलिए चूंकि अनुराग (लगाव) के मार्ग पर भक्त प्रतिकूल प्रयासों से हजारों मील दूर हैं, वे विधि, या विनियमित सिद्धांतों के मार्ग का उल्लंघन कभी नहीं करते हैं। बल्कि वे कृष्ण की सेवा के क्रम में विनियमित सिद्धांतों का पालन करते हुए निरंतर अनुराग के मार्ग पर बने रहते हैं। वे मूढ़ भौतिकवादी व्यक्ति जो भौतिक अवधारणाओं के कारण अनुराग के मार्ग पर सेवा को समझने में असमर्थ हैं, वे कृष्ण की सेवा के प्रति विमुख हो जाते हैं। इसलिए श्लोक अपि चेत सुदुराचारो [इस श्लोक का अनुवाद पृष्ठ 418 पर फुटनोट में देखें] श्री कृष्ण की भगवद-गीता में प्रकट हुआ है। इसका मतलब यह नहीं है कि स्वार्थ और भ्रष्टता से भरे पापमय जीवन को स्वतःस्फूर्त भक्ति सेवा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन इसे समझे बिना, प्राकृत-सहजिया, जो भौतिक भोग से जुड़े हैं, शुद्ध भक्तों और शुद्ध भक्ति सेवा के प्रति विद्रोह करते हैं और इस तरह नरक के मार्ग पर चल पड़ते हैं।
विनियमित भक्ति सेवा और उसके साथ नियमों और विनियमों के विषय कि श्री वेदव्यास ने स्मृतियों और पुराणों में वर्णन किए हैं, श्री गौरसुंदर और उनके अतुलनीय सेवकों के चरित्र में ठीक से चित्रित किए गए हैं।
