श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  2.16.141 
মুদ্রার সহিত নৈবেদ্যের যত বিধি
বেদ-রূপে আপনে বলেন গুণ-নিধি
मुद्रार सहित नैवेद्येर यत विधि
वेद-रूपे आपने बलेन गुण-निधि
 
 
अनुवाद
भगवान, जो दिव्य गुणों के भंडार हैं, ने स्वयं वेदों के माध्यम से भोजन अर्पित करने के नियमों को समझाया है।
 
The Lord, who is the repository of divine qualities, has Himself explained the rules for offering food through the Vedas.
तात्पर्य
भगवान को भोग लगाने के नियम इस प्रकार बताए गए हैं: भोग पर जल छिड़कते समय अस्त्राय फट् मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और चक्र-मुद्रा का प्रयोग करके उनकी रक्षा करनी चाहिए। इसके बाद अपनी उंगली को जल में डुबोकर वायु-बीज (यम्) का उच्चारण दस बार करना चाहिए और उस जल को भोग पर छिड़कना चाहिए। इस प्रक्रिया द्वारा भोग की शुष्कता को शुद्ध करने के बाद, व्यक्ति को मानसिक रूप से अपने दाहिने हाथ की हथेली में वाहिनी-बीज (रम) को रखना चाहिए और बाएँ हाथ को दाहिने हाथ के नीचे रखकर भोग के सामने प्रदर्शित करना चाहिए। इससे उत्पन्न होने वाली अग्नि से भोग की शुष्कता को मानसिक रूप से जला देना चाहिए। इसके बाद व्यक्ति को मानसिक रूप से अपने बाएँ हाथ की हथेली में अमृता-बीज (ठम) रखना चाहिए। फिर दाहिने हाथ को बाएँ हाथ के नीचे रखकर भोग के सामने प्रदर्शित करना चाहिए। फिर इस मुद्रा से उत्पन्न होने वाले अमृत को भोग पर छिड़कना चाहिए। इसके बाद, मूला-मंत्र का उच्चारण करते हुए पहले से शुद्ध किए गए जल को भोग पर छिड़कना चाहिए और विचार करना चाहिए कि पूरा भोग अमृत है। फिर अपने दाहिने हाथ से भोग को स्पर्श करते हुए, मूला-मंत्र का आठ बार उच्चारण करना चाहिए। इसके बाद, धेनु-मुद्रा का प्रयोग करते हुए, यह विचार करना चाहिए कि भोग पूर्ण है, और उस भोग की पूजा श्री हरि के साथ जल और चंदन के लेप जैसी सामग्रियों के साथ करनी चाहिए। इसके बाद, मुट्ठी भर फूलों को लेते हुए, श्री हरि की पूजा करनी चाहिए और इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए: "हे प्रभु, इस भोग को स्वीकार करने के लिए आपके कमल मुख से अग्नि उत्पन्न हो।" इसके बाद व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि प्रभु के मुख से अग्नि उत्पन्न हो रही है और भोग से संपर्क कर रही है। फिर अपने बाएँ हाथ से भोग को स्पर्श करते हुए और अपने दाहिने हाथ में चंदन का गूदा और फूल लेकर और मूला-मंत्र का उच्चारण करते हुए अंत में स्वाहा कहकर, "श्री-कृष्णाय इदं नैवेद्यं कल्पयामि" का उच्चारण करना चाहिए और अपने दाहिने हाथ से चंदन का गूदा और फूलों को जल के साथ भूमि पर फेंक देना चाहिए। इसके बाद भोग पर तुलसी के साथ भगवान को उचित मंत्रों के साथ भोग अर्पित करना चाहिए। भगवान को भोग अर्पित करने का मंत्र है "निवेदयामि भवते जुषानेदम हविर हर्रे"। फिर, "अमृतोपस्तरणम असि स्वाहा" मंत्र का उच्चारण करते हुए, व्यक्ति को भगवान को उनके हाथों और मुख को साफ करने के लिए जल अर्पित करना चाहिए और ग्रास-मुद्रा का प्रयोग करना चाहिए जो पूर्ण रूप से खिले हुए कमल से मिलता-जुलता है। वास्तव में व्यक्ति को अपने दाहिने हाथ से प्राण-मुद्रा से शुरू होकर पाँच मुद्राओं का प्रयोग करना चाहिए, पाँच संबंधित मंत्रों का उच्चारण करते हुए जो ओम से शुरू होते हैं और चतुर्थ (संबोधन) कारक और स्वाहा में समाप्त होते हैं। इसके बाद व्यक्ति को दो अंगूठों को बगल वाली तर्जनी अंगुलियों से छूना चाहिए, अर्पण के लिए उचित मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए, और भगवान के सामने अर्पण मुद्रा का प्रयोग करना चाहिए। अर्पण मुद्रा का प्रयोग करते समय उच्चारित किया जाने वाला मंत्र है "ठौ नमः पराय अवात्मने 'निरुद्धाय निवेद्यं-कल्पयामि"। जो व्यक्ति भगवान की भक्ति सेवा में लगे होते हैं, वे अपने आराध्य मंत्रों [गायत्री-मंत्रों] का उच्चारण करते हैं और भोग अर्पित करने के लिए ग्रास-मुद्रा का प्रयोग करते हैं, लेकिन वे हरि के कमल मुख से निकलने वाली अग्नि पर ध्यान नहीं देते हैं। मुख्य बात यह है कि वे वैष्णव शिष्टाचार के अनुसार हर्षपूर्वक श्री हरि को भोजन कराते हैं। (देखें हरि-भक्ति-विलास, आठवां विलास)
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)