अण्व अप्य उपाहृतं भक्तैः
प्रेम्णा भूर्य एव मे भवेत्।
भूर्य अप्य अभक्तोपाहृतं
न मे तोषाय कल्पते।
"मैं अपने भक्तों द्वारा प्रेम से मुझे अर्पित किये हुए छोटे से छोटे उपहार को भी महान मानता हूँ, लेकिन अभक्तों द्वारा दिये गए बड़े से बड़े उपहार मुझे प्रसन्न नहीं कर पाते।"
