श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.16.127 
প্রভু বলে,—“তোর খুদ-কণ মুঞি খাঙ
অভক্তের অমৃত উলটিঽ নাহি চাঙ”
प्रभु बले,—“तोर खुद-कण मुञि खाङ
अभक्तेर अमृत उलटिऽ नाहि चाङ”
 
 
अनुवाद
भगवान ने उत्तर दिया, "मैं तुम्हारे टूटे हुए चावल खाता हूँ, और अभक्तों द्वारा अर्पित अमृत से अपना मुँह मोड़ लेता हूँ।"
 
The Lord replied, "I eat your broken rice, and turn my face away from the nectar offered by non-devotees."
तात्पर्य
श्रीमद् भगवदम् (10.81.3) में कहा गया है:

अण्व अप्य उपाहृतं भक्तैः

प्रेम्णा भूर्य एव मे भवेत्।

भूर्य अप्य अभक्तोपाहृतं

न मे तोषाय कल्पते।

"मैं अपने भक्तों द्वारा प्रेम से मुझे अर्पित किये हुए छोटे से छोटे उपहार को भी महान मानता हूँ, लेकिन अभक्तों द्वारा दिये गए बड़े से बड़े उपहार मुझे प्रसन्न नहीं कर पाते।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)