श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 122-123
 
 
श्लोक  2.16.122-123 
“দরিদ্র সেবক মোর তুমি জন্ম জন্ম
আমারে সকল দিযা তুমি ভিক্ষু-ধর্ম
আমিহ তোমার দ্রব্য অনুক্ষণ চাই
তুমি না দিলে ও আমি বল করিঽ খাই
“दरिद्र सेवक मोर तुमि जन्म जन्म
आमारे सकल दिया तुमि भिक्षु-धर्म
आमिह तोमार द्रव्य अनुक्षण चाइ
तुमि ना दिले ओ आमि बल करिऽ खाइ
 
 
अनुवाद
"तुम जन्म-जन्मांतर से मेरे दरिद्र सेवक हो। मुझे सब कुछ देकर भीख मांगते हो। मुझे सदैव तुम्हारे भोजन की लालसा रहती है। यदि तुम मुझे न भी दो, तो भी मैं बलपूर्वक उसे लेकर खा लेता हूँ।"
 
"You have been my poor servant since many births. You give me everything and then beg. I always crave your food. Even if you don't give it to me, I take it by force and eat it."
तात्पर्य
श्री महाप्रभु ने शुक्लाम्बर से कहा, “तुम जन्मों-जन्मों से मेरे दीन-दुखी भक्त हो। तुम्हारी वैरागी वृत्ति के कारण तुम गृहस्थ धर्म में प्रवेश करने की इच्छा नहीं करते। तुम ब्रह्मचारी के रूप में घर-घर जा कर भीक्षा माँगते हो और जो भी पाओ, उसे मुझे अर्पित करते हो। तुम नैष्ठिक ब्रह्मचारी हो, अर्थात आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले हो। तुम गृहस्थ और वानप्रस्थ की सांसारिक मिथ्या अहंकार से भी मुक्त हो। परमहंस-धर्म में स्थित होकर तुमने एक त्यागी अकिंचन के कर्मों को स्वीकार कर लिया है। इसलिए तुम पूर्णतया समर्पित त्रिदंडी-भिक्षु, या वैष्णव संन्यासी हो। तुम अपने शरीर, मन और वाणी के सभी प्रयासों को मुझे पूर्ण रूप से अर्पित करने में सक्षम हो। मैं हमेशा तुम्हारे इस अर्पण का इंतजार करता रहता हूँ। तुम्हारा कोई भी चिंतन मुझे अर्पित करने के अलावा किसी और चीज का उपभोग करने का नहीं है। इसलिए मैं ने जबरदस्ती तुमसे सब कुछ छीन लिया, और उसके परिणामस्वरूप तुम दरिद्र हो।”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)