श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  2.16.115 
কৃষ্ণানন্দ-প্রসাদে দারিদ্র্য নাহি জানে
বলিযা বেডায ঽকৃষ্ণঽ সকল ভবনে
कृष्णानन्द-प्रसादे दारिद्र्य नाहि जाने
बलिया वेडाय ऽकृष्णऽ सकल भवने
 
 
अनुवाद
कृष्ण की कृपा पाकर वह आनंदित हो गया, उसे दरिद्रता का पता ही नहीं चला। वह घर-घर घूमते हुए कृष्ण का नाम जपता रहता।
 
He was filled with joy at Krishna's grace, and poverty was unnoticed. He wandered from house to house, chanting Krishna's name.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)