श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  2.16.113 
ঽভিখারীঽ করিযা জ্ঞান, লোকে নাহি চিনে
দরিদ্রের অবধি—করযে ভিক্ষাটনে
ऽभिखारीऽ करिया ज्ञान, लोके नाहि चिने
दरिद्रेर अवधि—करये भिक्षाटने
 
 
अनुवाद
लोग उसे भिखारी समझते थे और इसलिए उसे पहचान नहीं पाते थे। वह इतना गरीब था कि उसे अपना पेट पालने के लिए भीख मांगनी पड़ती थी।
 
People mistook him for a beggar and therefore didn't recognize him. He was so poor that he had to beg to feed himself.
तात्पर्य
बाहरी दृष्टि से धोखा खाकर, मूर्ख लोग शुक्लांबर ब्रह्मचारी को एक साधारण भिखारी मानते थे जो इंद्रिय तृप्ति चाहता था। गरीबी या अभाव के आदर्श उदाहरण कृष्ण के भक्तों के कार्यों में दिखाए गए हैं जो भिक्षुओं या भिखारियों की तरह कपड़े पहनते हैं। उन्हें वे लोग नहीं समझ सकते हैं जो तीन प्रकार के झूठे अहंकार से पागल हो जाते हैं। जो लोग झूठे अहंकार से भरे हुए हैं और भ्रम ऊर्जा से भ्रमित हैं, वे प्रभु के भक्तों को गरीबी से पीड़ित मानते हैं और अपने कर्मों के फलों का आनंद लेने के लिए मजबूर करते हैं, लेकिन वे वैष्णवों में गरीबी, कमी या भौतिक संपत्ति की कमी को समझने में असमर्थ हैं। हालाँकि ऐसे वैष्णव ऊँचे होते हैं, लेकिन वे जीवित संस्थाओं को अज्ञात-सुकृत, या कुछ अज्ञात भक्ति सेवा जमा करने में मदद करने के लिए गरीब हाउसहोल्डर्स के घरों में जाते हैं। चैतन्य-चरितामृत (मध्यम 8.39) में कहा गया है:

महंत-स्वभाव एइ तारिते पामरा

निजा कार्य नाही tabu याना तारा धारा

"सभी संत लोगों का सामान्य अभ्यास पतितों को मुक्त करना है। इसलिए वे लोगों के घरों में जाते हैं, हालाँकि उनका वहाँ कोई व्यक्तिगत व्यवसाय नहीं होता है।" परिणामस्वरूप, दाता को अज्ञात-सुकृत प्राप्त होता है। केवल वे ही जो इस आध्यात्मिक प्रवृत्ति को समझ सकते हैं, भक्ति सेवा के मंदिर में एक भिखारी का वेश धारण करके और भौतिक वस्तुओं से जुड़े मूर्ख लोगों को पवित्रता प्राप्त करने में मदद करके हरि की पूजा करने में सक्षम हैं। पवित्र ब्राह्मण व्यवहार को स्वीकार करते हुए, भक्ति सेवा के मंदिर में भिखारी भौतिकवादी ब्राह्मण व्यवहार के मंच पर बने रहने से आत्म-धोखे में नहीं पड़ते हैं, बल्कि अपने सभी संचित भिक्षा को कृष्ण की सेवा में लगाते हैं। चूंकि वैष्णव कृष्ण के विरोधी और कर्म के फलों का आनंद लेने के उद्देश्य से इंद्रिय तृप्ति पर आधारित तथाकथित ब्राह्मणवाद में नहीं रहते हैं, वे सब कुछ कृष्ण की सेवा में लगाते हैं और दुनिया के मूर्खों को अपनी विशेषताओं और उच्च स्थिति को समझने की अनुमति नहीं देते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)