श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  2.16.111 
পরম স্বধর্ম-রত, পরম সুশান্ত
চিনিতে না পারে কেহ পরম মহান্ত
परम स्वधर्म-रत, परम सुशान्त
चिनिते ना पारे केह परम महान्त
 
 
अनुवाद
वह हमेशा अपने काम में लगे रहते थे और बहुत शांत स्वभाव के थे। हालाँकि किसी को पता नहीं था, फिर भी वह एक महान भक्त थे।
 
He was always focused on his work and had a very calm demeanor. Although no one knew it, he was a great devotee.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)