श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  2.16.108 
ভাগ্য-অনুরূপ কৃপা করযে সবারে
ডুবিলা বৈষ্ণব সব আনন্দ-সাগরে
भाग्य-अनुरूप कृपा करये सबारे
डुबिला वैष्णव सब आनन्द-सागरे
 
 
अनुवाद
जब उन्होंने सभी पर उनके सौभाग्य के अनुसार कृपा की, तो सभी वैष्णव आनंद के सागर में डूब गए।
 
When He showered His grace on everyone according to their good fortune, all the Vaishnavas were immersed in an ocean of bliss.
तात्पर्य

महाप्रभु के विविध लीलाएँ अपने आध्यात्मिक स्तर के अनुसार उनके भक्तों को ही दिखाई पड़ती हैं। निरपेक्षवादी जो भगवान के प्रति उदासीन होते हैं, वे भगवान की कृपा पाने के बिल्कुल भी योग्य नहीं होते। धर्मनिष्ठ कार्यो में निपुण और फलदायी क्रियाकलापों में लिप्त लोग सोचते हैं कि उन्होंने मायावी आशीर्वाद प्राप्त करके अस्थायी भौतिक सुख में अपनी वांछित पूर्णता प्राप्त कर ली है। भक्त की सेवा में संलग्न होने के भक्त के प्रयास के अनुपात में परम प्रभु उसके प्रेम को नियंत्रित करता है। स्वार्थी फलदायी कर्मियों द्वारा अस्थायी सुख का आनंद लेना और मानसिक सट्टेबाजों द्वारा अवैयक्तिक ब्रह्म की पूजा करना "दया" नहीं कहा जा सकता। उनकी पवित्रता के कारण, प्रभु के भक्त अप्रतिबंधित इंद्रिय सुख, फलदायी गतिविधियों और मानसिक अटकलों के दुर्भाग्य से मुक्त हो जाते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)