| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 2: मध्य-खण्ड » अध्याय 16: भगवान का शुक्लाम्बर के चावल को स्वीकार करना » श्लोक 105 |
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| | | | श्लोक 2.16.105  | ক্ষণে ক্ষণে মূর্ছা হয, ক্ষণে মহাকম্প
ক্ষণে তৃণ লয করে, ক্ষণে মহা-দম্ভ | क्षणे क्षणे मूर्छा हय, क्षणे महाकम्प
क्षणे तृण लय करे, क्षणे महा-दम्भ | | | | | | अनुवाद | | कभी भगवान् बेहोश हो जाते, कभी उनका शरीर काँप उठता, कभी वे दाँतों तले तिनका दबा लेते, और कभी वे बहुत अभिमानी हो जाते। | | | | Sometimes the Lord would faint, sometimes his body would tremble, sometimes he would hold a straw between his teeth, and sometimes he would become very arrogant. | |
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