श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 14: यमराज का संकीर्तन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  2.14.46 
নাচে ইন্দ্র সুরেশ্বর, মহাবীর বজ্রধর,
আপনারে করে অনুতাপ
সহস্র-নযনে ধর, অবিরত বহে যাঙ্র,
সফল হৈল ব্রহ্ম-শাপ
नाचे इन्द्र सुरेश्वर, महावीर वज्रधर,
आपनारे करे अनुताप
सहस्र-नयने धर, अविरत वहे याङ्र,
सफल हैल ब्रह्म-शाप
 
 
अनुवाद
वज्रधारी और देवताओं पर शासन करने वाले शक्तिशाली इंद्र ने नृत्य करते हुए स्वयं को धिक्कारा। उनके एक हजार नेत्रों से निरंतर आँसू बह रहे थे, जिससे ब्राह्मण का श्राप फलित हो रहा था।
 
Indra, the mighty thunderbolt-wielder and ruler of the gods, danced and cursed himself. Tears flowed continuously from his thousand eyes, fulfilling the Brahmin's curse.
तात्पर्य
"सफ़ला हैला ब्रह्म-शाप" वाक्य को निम्न प्रकार से समझाया गया है: देवराज इन्द्र को गौतम ऋषि के शाप के कारण हज़ारों योनियाँ मिलीं। बाद में जब वो प्रार्थना से गौतम ऋषि को प्रसन्न किये, तो उसकी कृपा से वो सभी योनियाँ आँखों में बदल गयीं। आज वो हज़ारों आँखें जो ब्राह्मण के शाप के कारण प्राप्त हुयीं, गौरसुन्दर के लीलाओं को देखकर सार्थक हो गईं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)