श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 14: यमराज का संकीर्तन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.14.44 
দেবর্ষি নারদ নাচে, রহিযা ব্রহ্মার পাছে
নযনে বহযে প্রেম-জল
পাইযা যশের সীমা, কোথা বা রহিল বীণা,
না জানযে আনন্দে বিহ্বল
देवर्षि नारद नाचे, रहिया ब्रह्मार पाछे
नयने वहये प्रेम-जल
पाइया यशेर सीमा, कोथा वा रहिल वीणा,
ना जानये आनन्दे विह्वल
 
 
अनुवाद
देवर्षि नारद जब ब्रह्मा के पास नृत्य कर रहे थे, तो उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बह निकले। भगवान की असीम महिमा का अनुभव करके, वे इतने आनंद में डूब गए कि अपनी वीणा भूल गए।
 
As the sage Narada danced beside Brahma, tears of love flowed from his eyes. Experiencing the Lord's infinite glory, he became so ecstatic that he forgot his veena.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)