श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 14: यमराज का संकीर्तन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.14.37 
নাচৈ ধর্মরাজ, ছাডিযা সকল লাজ
কৃষ্ণাবেশে না জানে আপনাসঙ্
অরিযাশ্রী-চৈতন্য, বলে,—“অতি ধন্য ধন্য,
পতিত-পাবন ধন্যবানা”
नाचै धर्मराज, छाडिया सकल लाज
कृष्णावेशे ना जाने आपनासङ्
अरियाश्री-चैतन्य, बले,—“अति धन्य धन्य,
पतित-पावन धन्यवाना”
 
 
अनुवाद
धर्मराज ने सारी लज्जा त्याग दी और नाचने लगे। कृष्ण के प्रेम में वे स्वयं को भूल गए। श्री चैतन्य का स्मरण करते हुए, उन्होंने कहा, "पतित आत्माओं के उदार उद्धारक की जय हो!"
 
Dharmaraja abandoned all shyness and began to dance. He lost himself in love for Krishna. Remembering Sri Chaitanya, he said, "Victory to the benevolent savior of fallen souls!"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)