श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 14: यमराज का संकीर्तन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  2.14.21 
স্বভাব বৈষ্ণব যম—মূর্তিমন্ত ধর্ম
ভাগবত-ধর্মের জানযে সব মর্ম
स्वभाव वैष्णव यम—मूर्तिमन्त धर्म
भागवत-धर्मेर जानये सब मर्म
 
 
अनुवाद
यमराज स्वभाव से वैष्णव थे और धार्मिक सिद्धांतों के साक्षात् स्वरूप थे। वे भागवत-धर्म के गूढ़ तात्पर्यों को जानते थे।
 
Yamaraja was a Vaishnava by nature and the embodiment of religious principles. He understood the profound implications of the Bhagavata Dharma.
तात्पर्य
एक महान जन यमराज के रूप में भागवत-धर्म के नाम से जाने जाने वाले धार्मिक सिद्धांतों को जानते है। श्रीमद भागवतम (६.३.२०-२१) में कहा गया है:

स्वयंभु नारदः शंभू

कुमारः कपिलो मनुः

प्रह्लादो जनको भीष्मो

बलि वैयांसकिर वयम्

द्वादशैते विजानीमो

धर्मं भागवतं भटाः

गुह्यं विशुद्धं दुर्बोधं

यं ज्ञात्वामृतम अश्नुत

"हे मेरे सेवकों, भगवान ब्रह्मा, भगवान नारद, भगवान शिव, चार कुमार, भगवान कपिल [देवहूति के पुत्र], स्वायंभुव मनु, प्रह्लाद महाराज, जनक महाराज, दादा भीष्म, बलि महाराज, शुकदेव गोस्वामी और मैं स्वयं—हम बारह वास्तविक धार्मिक सिद्धांतों को जानते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)