| श्री चैतन्य भागवत » खण्ड 2: मध्य-खण्ड » अध्याय 12: नित्यानंद प्रभु की महिमा » श्लोक 55-57 |
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| | | | श्लोक 2.12.55-57  | প্রভু বলে,—“এই নিত্যানন্দ-স্বরুপেরে
যে করযে ভক্তি-শ্রদ্ধা, সে করে আমারে
ইহান চরণ—শিব-ব্রহ্মার বন্দিত
অতএব ইহানে করিহ সবে প্রীত
তিলার্ধেক ইহানে যাহার দ্বেষ রহে
ভক্ত হৈলে ও সে আমার প্রিয নহে | प्रभु बले,—“एइ नित्यानन्द-स्वरुपेरे
ये करये भक्ति-श्रद्धा, से करे आमारे
इहान चरण—शिव-ब्रह्मार वन्दित
अतएव इहाने करिह सबे प्रीत
तिलार्धेक इहाने याहार द्वेष रहे
भक्त हैले ओ से आमार प्रिय नहे | | | | | | अनुवाद | | भगवान ने कहा, "जो कोई भी इस नित्यानंद स्वरूप में श्रद्धा रखता है और उनकी सेवा में लगा रहता है, वह वास्तव में मेरी ही सेवा करता है। उनके चरणकमलों की पूजा ब्रह्मा और शिवजी करते हैं। इसलिए तुम सब उनसे प्रेम करो। यदि कोई व्यक्ति उनके प्रति ज़रा भी ईर्ष्या रखता है, तो वह भक्त होने पर भी मुझे प्रिय नहीं है।" | | | | The Lord said, "Whoever has faith in this eternally blissful form and is engaged in His service, truly serves Me. His lotus feet are worshipped by Brahma and Shiva. Therefore, all of you should love Him. If anyone has even the slightest jealousy towards Him, he is not dear to Me even if he is a devotee." | |
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