श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 12: नित्यानंद प्रभु की महिमा  »  श्लोक 39-40
 
 
श्लोक  2.12.39-40 
কেহ বলে,—“আজি হৈলাম কৃষ্ণ-দাস”
কেহ বলে,—“আজি ধন্য দিবস-প্রকাশ”
কেহ বলে,—“পাদোদক বড স্বাদু লাগে
এখনো মুখের মিষ্টতা নাহি ভাঙ্গে”
केह बले,—“आजि हैलाम कृष्ण-दास”
केह बले,—“आजि धन्य दिवस-प्रकाश”
केह बले,—“पादोदक बड स्वादु लागे
एखनो मुखेर मिष्टता नाहि भाङ्गे”
 
 
अनुवाद
किसी ने कहा, “आज मैं कृष्ण का सेवक बन गया हूँ।” किसी ने कहा, “आज मेरे लिए सबसे शुभ दिन है।” किसी और ने कहा, “यह जल इतना स्वादिष्ट है कि मेरे मुँह में अभी भी मिठास महसूस हो रही है।”
 
Someone said, “Today I have become a servant of Krishna.” Another said, “Today is the most auspicious day for me.” Someone else said, “This water is so delicious that I can still feel the sweetness in my mouth.”
तात्पर्य
श्री गौरासुंदर के आदेश पर श्री नित्यानंद के चरणों को धोने वाले जल को पीने के बाद कोई कहता है, "नितयानंद के पैरों का पानी बहुत स्वादिष्ट होता है। इस पानी को पीने के बाद उसका मीठा स्वाद नहीं जाता। इस पानी को पीने के बाद भी उसके मीठे स्वाद बहुत देर तक मुंह में बना रहता है।" चूंकि साधारण मूर्ख व्यक्ति नित्यानंद के पैरों को धोने वाले पानी को साधारण पानी ही समझते हैं, इसलिए वे भौतिक इच्छाओं की रस्सियों में उलझे रहते हैं। लेकिन इस पानी की महिमा ऐसी है कि इसे पीने वाला भक्त आत्म-साक्षात्कारी बन जाता है और प्रभु के सेवक के रूप में अपनी शाश्वत स्थिति को समझता है। इस बीच, किसी और ने कहा, "आज सारा अशुभ दूर हो गया है और आत्म-साक्षात्कार का एक नया युग शुरू हुआ है।" जो लोग श्री नित्यानंद के चरण-कमलों को साधारण जीवों के चरणों के समान समझते हैं और इसलिए उन चरण-कमलों में रुचि नहीं रखते हैं, उन्हें कृष्ण की भक्ति से रहित समझा जाता है। जो लोग प्रभु के चरण-कमलों को धोने वाले पानी को पीते हैं, वे नशे में हो जाते हैं और लगातार प्रभु के पवित्र नामों का जप करते हैं, और जो भौतिक भोग के नशे में धुत होते हैं, वे खुद को नित्यानंद समझते हैं जबकि "आध्यात्मिक गुरु" बनते हैं। ऐसे नारकीय व्यक्तियों की भौतिक अवधारणाओं से उनका गलत अहंकार और मूर्खता बढ़ जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)