श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 11: नित्यानंद का चरित  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.11.17 
আমারে না দিযা ভাত সুখে তুমি খাও
অপকীর্তি আর কেন বলিযা বেডাও?”
आमारे ना दिया भात सुखे तुमि खाओ
अपकीर्ति आर केन बलिया वेडाओ?”
 
 
अनुवाद
"तुम मुझे चावल नहीं खिलाते, जबकि खुद मजे से खाते हो। वरना तुम सबको मेरे कुकर्म क्यों बताते हो?"
 
"You don't feed me rice, even though you eat it happily yourself. Otherwise, why do you tell everyone about my misdeeds?"
तात्पर्य
व्रज लीला में श्री कृष्ण के श्री बलदेव के कथन से प्रेरित होकर नित्यानंद ने श्री गौरसुंदर से प्रेमपूर्वक झगड़ा करते हुए कहा "नंद महाराज के घर रहते हुए तुम (कृष्ण) हमेशा यशोदा से खाने की मांग करते हो और उनका आनंद लेते हो, जबकि अगर मैं खाने की कोशिश करता हूँ तो तुम मुझे आलोचना करते हो और सबके सामने मेरी शरारतों के विषय बता देते हो। यह तो स्वार्थ के सिवा और कुछ नहीं है।" भगवान नियमित रूप से माता शची के घर भोजन करते थे। वहाँ अपना हिस्सा न पाने के कारण और व्रज की भावना में डूबे होने के कारण नित्यानंद ने गौरसुंदर के साथ बातचीत करते हुए इस तरह बात की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)