ज्ञान प्रयासं उदापस्य नमंत एव
जीवंति सं-मुखरितां भवदीय-वार्तम्
स्थाने स्थितः श्रुति-गतां तनु-वाङ-मनोभिर
ये प्रायशो 'जित जितो 'प्यसि तैस्त्रि-लोख्यम्
"जो लोग, अपनी स्थापित सामाजिक स्थिति में रहते हुए भी, सट्टा ज्ञान की प्रक्रिया को त्याग देते हैं और अपने शरीर, शब्दों और मन से आपके व्यक्तित्व और गतिविधियों के वर्णन का पूरा सम्मान करते हैं, अपने जीवन को इन वर्णनों के लिए समर्पित करते हैं, जो आपके द्वारा व्यक्तिगत रूप से और आपके द्वारा कंपन किए जाते हैं। आपके शुद्ध भक्त, निश्चित रूप से आपके आधिपत्य को जीत लेते हैं, यद्यपि आप अन्यथा तीनों लोकों के भीतर किसी के द्वारा भी अजेय हैं।"
