श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 312
 
 
श्लोक  2.10.312 
কাহারে না করে নিন্দা, ঽকৃষ্ণ কৃষ্ণঽ বলে
অজয চৈতন্য সেই জিনিবেক হেলে
काहारे ना करे निन्दा, ऽकृष्ण कृष्णऽ बले
अजय चैतन्य सेइ जिनिबेक हेले
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति किसी की निन्दा किये बिना कृष्ण के नामों का जप करता है, वह आसानी से अजेय भगवान चैतन्य को जीत लेता है।
 
One who chants the names of Krishna without criticizing anyone easily conquers the invincible Lord Chaitanya.
तात्पर्य
श्री चैतन्यदेव अभिमानी और मोहित जीवों के भौतिक ज्ञान से अप्राप्य हैं। जो व्यक्ति दूसरों को ठेस पहुंचाए बिना लगातार कृष्ण के नाम का जाप करते हैं, वे आसानी से अपने प्रेम से अपराजेय श्री चैतन्यदेव को नियंत्रित कर सकते हैं। श्रीमद भागवतम् (10.14.3) में कहा गया है:

ज्ञान प्रयासं उदापस्य नमंत एव

जीवंति सं-मुखरितां भवदीय-वार्तम्

स्थाने स्थितः श्रुति-गतां तनु-वाङ-मनोभिर

ये प्रायशो 'जित जितो 'प्यसि तैस्त्रि-लोख्यम्

"जो लोग, अपनी स्थापित सामाजिक स्थिति में रहते हुए भी, सट्टा ज्ञान की प्रक्रिया को त्याग देते हैं और अपने शरीर, शब्दों और मन से आपके व्यक्तित्व और गतिविधियों के वर्णन का पूरा सम्मान करते हैं, अपने जीवन को इन वर्णनों के लिए समर्पित करते हैं, जो आपके द्वारा व्यक्तिगत रूप से और आपके द्वारा कंपन किए जाते हैं। आपके शुद्ध भक्त, निश्चित रूप से आपके आधिपत्य को जीत लेते हैं, यद्यपि आप अन्यथा तीनों लोकों के भीतर किसी के द्वारा भी अजेय हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)