श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 282
 
 
श्लोक  2.10.282 
এ-সব লীলার কভু নাহি পরিচ্ছেদ
ঽআবির্ভাব, তিরোভাবঽ—এই কহে বেদ
ए-सब लीलार कभु नाहि परिच्छेद
ऽआविर्भाव, तिरोभावऽ—एइ कहे वेद
 
 
अनुवाद
यद्यपि वेदों में भगवान के “आगमन” और “अन्त” का वर्णन है, किन्तु वास्तव में उनकी लीलाओं का कोई अन्त नहीं है।
 
Although the Vedas describe the “arrival” and “end” of the Lord, in reality there is no end to His pastimes.
तात्पर्य
श्री गौरसुंदर के विविधकालिक मनोरम कर्म किसी जीव के उन सामान्य कर्मों के समान नहीं हैं जिनके फल उसे कर्मों के अनुसार भोगने ही पड़ते हैं। क्योंकि प्रभु की लीलाएँ नित्य हैं, इसलिए यह नहीं सोचना चाहिए कि ये प्रकट होकर और लुप्त होकर काल के अधिकार में हैं। गोपाल-तापनी के उत्तर-खंड में कहा है- आविर्भाव-तिरोभाव स्वपदे तिष्ठति - "प्रभु का भले ही आविर्भाव और तिरोभाव होता है परंतु वे नित्य गोलोक में ही निवास करते हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)