मन्ये धनभिजन-रूप-तपः-श्रुतौजः
तेजः-प्रभाव-बल-पौरुष-बुद्धि-योगाः
नाराधनया हि भवन्ति परस्य पुंसो
भक्त्या तुषोष भगवान गज-यूथ-पाया
"कोई धन, कुलीन परिवार, सुंदरता, तपस्या, शिक्षा, संवेदी विशेषज्ञता, तेज, प्रभाव, शारीरिक शक्ति, परिश्रम, बुद्धि और रहस्यमयी योगिक शक्ति रख सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि इन सभी योग्यताओं से भी कोई भगवान का संतुष्टि नहीं कर सकता। हालाँकि, कोई व्यक्ति भक्ति सेवा से प्रभु को संतुष्ट कर सकता है। गजेंद्र ने ऐसा किया, और इस प्रकार प्रभु उससे संतुष्ट हुए।" श्री चैतन्य-मंगल में कहा गया है:
व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्दस्य
काकुब्जायाः किमु नाम रूपमधिकं किमतत् सुदामनो धनम
वंशः को विदुरस्य यादव-पतेरुग्रस्य किं पौरुषम
भक्त्या तुष्यतिकेवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः
"क्या धर्म नामक शिकारी के पास कोई पवित्रता थी? क्या उम्र ने पाँच साल के ध्रुव को अयोग्य बना दिया था? क्या त्रिकूट पर्वत पर रहने वाले गजेंद्र के पास कोई शिक्षा थी? क्या कंस की दासी मथुरा की कुब्जा के पास कोई सुंदरता थी? क्या कृष्ण के मित्र सुदामा ब्राह्मण के पास कोई धन था? क्या विदुर की सामाजिक स्थिति ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया? क्या यादवों के राजा उग्रसेन का पराक्रम उन्हें अयोग्य घोषित करता था? माधव उनकी भक्ति सेवा से प्रसन्न हुए, वह भौतिक गुणों से प्रसन्न नहीं होते।"
