श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 279
 
 
श्लोक  2.10.279 
বড কীর্তি হৈলে চৈতন্য নাহি পাই
ঽভক্তি-বশ সবে প্রভুঽ—চারি-বেদে গাই
बड कीर्ति हैले चैतन्य नाहि पाइ
ऽभक्ति-वश सबे प्रभुऽ—चारि-वेदे गाइ
 
 
अनुवाद
लोकप्रिय प्रशंसा से श्री चैतन्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। चारों वेद कहते हैं, "भगवान केवल भक्ति से ही वश में होते हैं।"
 
Sri Chaitanya cannot be attained through popular acclaim. The four Vedas say, "God can be controlled only through devotion."
तात्पर्य
यदि कोई बहुत से अनुयायी बनाकर, कई वैष्णव समागमों का आयोजन करके, लोगों के लिए बहुत से मंदिरों का निर्माण जैसे कल्याणकारी कार्य करके भी नाम और यश अर्जित करता है, तब भी वह श्री चैतन्यदेव की कृपा प्राप्त नहीं कर पाता। चारों वेद घोषणा करते हैं कि श्री चैतन्यदेव केवल निःस्वार्थ प्रेमयुक्त भक्तिमय सेवा द्वारा नियंत्रित होते हैं। श्रीमद् भागवत (7.9.9) में कहा गया है:

मन्ये धनभिजन-रूप-तपः-श्रुतौजः

तेजः-प्रभाव-बल-पौरुष-बुद्धि-योगाः

नाराधनया हि भवन्ति परस्य पुंसो

भक्त्या तुषोष भगवान गज-यूथ-पाया

"कोई धन, कुलीन परिवार, सुंदरता, तपस्या, शिक्षा, संवेदी विशेषज्ञता, तेज, प्रभाव, शारीरिक शक्ति, परिश्रम, बुद्धि और रहस्यमयी योगिक शक्ति रख सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि इन सभी योग्यताओं से भी कोई भगवान का संतुष्टि नहीं कर सकता। हालाँकि, कोई व्यक्ति भक्ति सेवा से प्रभु को संतुष्ट कर सकता है। गजेंद्र ने ऐसा किया, और इस प्रकार प्रभु उससे संतुष्ट हुए।" श्री चैतन्य-मंगल में कहा गया है:

व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्दस्य

काकुब्जायाः किमु नाम रूपमधिकं किमतत् सुदामनो धनम

वंशः को विदुरस्य यादव-पतेरुग्रस्य किं पौरुषम

भक्त्या तुष्यतिकेवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः

"क्या धर्म नामक शिकारी के पास कोई पवित्रता थी? क्या उम्र ने पाँच साल के ध्रुव को अयोग्य बना दिया था? क्या त्रिकूट पर्वत पर रहने वाले गजेंद्र के पास कोई शिक्षा थी? क्या कंस की दासी मथुरा की कुब्जा के पास कोई सुंदरता थी? क्या कृष्ण के मित्र सुदामा ब्राह्मण के पास कोई धन था? क्या विदुर की सामाजिक स्थिति ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया? क्या यादवों के राजा उग्रसेन का पराक्रम उन्हें अयोग्य घोषित करता था? माधव उनकी भक्ति सेवा से प्रसन्न हुए, वह भौतिक गुणों से प्रसन्न नहीं होते।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)