श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 255
 
 
श्लोक  2.10.255 
ভক্তি-স্থানে অপরাধ কৈলে, ঘুচে ভক্তি
ভক্তির অভাবে ঘুচে দরশন-শক্তি
भक्ति-स्थाने अपराध कैले, घुचे भक्ति
भक्तिर अभावे घुचे दरशन-शक्ति
 
 
अनुवाद
“यदि कोई भक्ति का अपराध करता है, तो उसकी भक्ति नष्ट हो जाती है, और जो भक्ति से रहित है, उसे मेरे दर्शन से कोई लाभ नहीं मिलता।
 
“If anyone commits a crime against devotion, his devotion is destroyed, and he who is devoid of devotion does not get any benefit from My darshan.
तात्पर्य
जो व्यक्ति भगवद्-भक्ति का विरोध कर अपराधी बन जाता है, वह कभी भी सेवाभाव का विकास नहीं कर सकता है। इस प्रकार सेवा-भाव से वंचित होकर, प्रभु का दर्शन व्यर्थ हो जाता है। जो लोग प्रभु की सेवा में प्रवृत्त हैं, उनके अतिरिक्त और कोई भी प्रभु के दर्शन से सुख प्राप्त नहीं कर सकता। क्योंकि अन्य लोग परमेश्वर को भोग की वस्तु मानते हैं, इसलिए उनमें सेवाभाव का अभाव होता है और वे उस शाश्वत सुख को प्राप्त नहीं कर पाते हैं, जो कि प्रभु के दर्शन का वास्तविक फल है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)