श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 246-248
 
 
श्लोक  2.10.246-248 
এই তোরে সত্য কহোঙ্, বড প্রিয তুমি
বেদ-মুখে বলিযাছি যত কিছু আমি
যে-যে-কর্ম কৈলে হয, যে-যে-দিব্য-গতি
তাহা ঘুচাইতে পারে কাহার শকতি?
মুঞি পারোঙ্ সকল অন্যথা করিবারে
সর্ব-বিধি-উপরে মোহার অধিকারে
एइ तोरे सत्य कहोङ्, बड प्रिय तुमि
वेद-मुखे बलियाछि यत किछु आमि
ये-ये-कर्म कैले हय, ये-ये-दिव्य-गति
ताहा घुचाइते पारे काहार शकति?
मुञि पारोङ् सकल अन्यथा करिबारे
सर्व-विधि-उपरे मोहार अधिकारे
 
 
अनुवाद
"तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो। मैं तुमसे सत्य कह रहा हूँ। वेदों में मेरे द्वारा बताए गए विभिन्न कर्तव्यों और उनके फल को निष्प्रभावी करने की शक्ति किसमें है? केवल मैं ही इन्हें बदल सकता हूँ, क्योंकि मेरा अधिकार सभी नियमों और विनियमों से परे है।"
 
"You are very dear to me. I am telling you the truth. Who has the power to nullify the various duties and their results that I have prescribed in the Vedas? Only I can change them, for my authority transcends all rules and regulations."
तात्पर्य
"यह निश्चित रूप से सच है कि तुम मेरे बहुत प्रिय हो, क्योंकि तुम हमेशा मेरे पवित्र नामों का जाप करते रहते हो। वैदिक साहित्यों में जो विषय कर्मियों की योग्यता के अनुसार निर्धारित हैं जो अपनी गतिविधियों के फलों की इच्छा करते हैं और उपनिषदों के विषय, जो वेदों के प्रमुख हैं, जो ज्ञानियों की योग्यता के अनुसार निर्धारित हैं जो मुक्ति की इच्छा रखते हैं, वे ऐसे नुस्खे हैं जो केवल संबंधित कर्मियों और ज्ञानियों पर लागू होते हैं। लेकिन मेरा आदेश उन सभी नियमों और विनियमों से अधिक शक्तिशाली है।" ब्रह्म-वैवर्त पुराण में यह कहा गया है:

दैवाधीनं जगत् सर्वं जन्म-कर्म शुभाशुभम

संयोगः च वियोगः च न च दैवात् परं बलं

कृष्णायत्तं च तद् दैवं स दैवात् परतस्ततः

भजन्ति सततं संतः परमात्मानं ईश्वरम्

दैवं वर्धयितुंशक्तः क्षयं कर्तुं स्वलीलयान

दैव-बद्ध तद् भक्तः चाविनंशी च निर्गुणः

“एक मानव के सभी कार्य विधान के नियंत्रण में हैं। इसके बारे में क्या कहना, संपूर्ण विश्व विधान के नियंत्रण में है। जन्म, गतिविधियाँ, पवित्र और अधर्मी कार्यों के परिणाम, और सभी जीवित संस्थाओं का मिलन और अलगाव विधान के नियंत्रण में है। इसलिए विधान से श्रेष्ठ कोई शक्ति नहीं है। फिर भी भगवान कृष्ण विधान से बड़े हैं। चूंकि विधान भगवान कृष्ण के नियंत्रण में है, इसलिए संत लोग कृष्ण की पूजा करते हैं, जो परमात्मा और भगवान है। अपने अतीत के कार्यों के माध्यम से, श्री कृष्ण इस विधान को कम या विस्तारित कर सकते हैं। इसलिए भगवान कृष्ण के भक्त विधान से बंधे नहीं हैं। वे अविनाशी और पारलौकिक हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)