दैवाधीनं जगत् सर्वं जन्म-कर्म शुभाशुभम
संयोगः च वियोगः च न च दैवात् परं बलं
कृष्णायत्तं च तद् दैवं स दैवात् परतस्ततः
भजन्ति सततं संतः परमात्मानं ईश्वरम्
दैवं वर्धयितुंशक्तः क्षयं कर्तुं स्वलीलयान
दैव-बद्ध तद् भक्तः चाविनंशी च निर्गुणः
“एक मानव के सभी कार्य विधान के नियंत्रण में हैं। इसके बारे में क्या कहना, संपूर्ण विश्व विधान के नियंत्रण में है। जन्म, गतिविधियाँ, पवित्र और अधर्मी कार्यों के परिणाम, और सभी जीवित संस्थाओं का मिलन और अलगाव विधान के नियंत्रण में है। इसलिए विधान से श्रेष्ठ कोई शक्ति नहीं है। फिर भी भगवान कृष्ण विधान से बड़े हैं। चूंकि विधान भगवान कृष्ण के नियंत्रण में है, इसलिए संत लोग कृष्ण की पूजा करते हैं, जो परमात्मा और भगवान है। अपने अतीत के कार्यों के माध्यम से, श्री कृष्ण इस विधान को कम या विस्तारित कर सकते हैं। इसलिए भगवान कृष्ण के भक्त विधान से बंधे नहीं हैं। वे अविनाशी और पारलौकिक हैं।"
