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श्लोक 2.10.242  |
সহজে একান্ত ভক্ত,—কি কহিব সীমা?
চৈতন্য-প্রিযের মাঝে যাহার গণনা |
सहजे एकान्त भक्त,—कि कहिब सीमा?
चैतन्य-प्रियेर माझे याहार गणना |
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| अनुवाद |
| मुकुंद स्वभाव से ही अनन्य भक्त थे। मैं उनकी महिमा का वर्णन कैसे करूँ? वे भगवान चैतन्य के प्रिय पार्षदों में गिने जाते हैं। |
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| Mukunda was by nature an exclusive devotee. How can I describe his greatness? He is counted among the beloved associates of Lord Chaitanya. |
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