श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 196
 
 
श्लोक  2.10.196 
অপরাধী-শরীর ছাডিব আজি আমি
দেখিব কতেক কালে—ইহা নাহি জানি”
अपराधी-शरीर छाडिब आजि आमि
देखिब कतेक काले—इहा नाहि जानि”
 
 
अनुवाद
“आज मैं इस घृणित शरीर को त्याग दूँगा, क्योंकि मैं नहीं जानता कि मैं उसे फिर कब देख पाऊँगा।”
 
“Today I will leave this disgusting body, because I do not know when I will see it again.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)