श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 179
 
 
श्लोक  2.10.179 
মুকুন্দ তোমার প্রিয, মোঽসবার প্রাণ
কেবা নাহি দ্রবে শুনিঽ মুকুন্দের গান?
मुकुन्द तोमार प्रिय, मोऽसबार प्राण
केबा नाहि द्रवे शुनिऽ मुकुन्देर गान?
 
 
अनुवाद
"मुकुंद आपको प्रिय हैं, और वे हम सबका जीवन हैं। मुकुंद का गायन सुनकर किसका हृदय द्रवित नहीं होता?"
 
"Mukunda is dear to you, and he is the life of all of us. Whose heart does not melt when he hears Mukunda's singing?"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)