श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 176
 
 
श्लोक  2.10.176 
নিরবধি কীর্তন করযে, প্রভু শুনে
কোন জন না বুঝে,—তথাপি দণ্ড কেনে
निरवधि कीर्तन करये, प्रभु शुने
कोन जन ना बुझे,—तथापि दण्ड केने
 
 
अनुवाद
जब भी वह जप करता, भगवान हमेशा सुनते। कोई समझ नहीं पा रहा था कि उसे दंड क्यों दिया जा रहा है।
 
Whenever he chanted, God always listened. No one could understand why he was being punished.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)