श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  2.10.162 
বৈষ্ণবাগ্রগণ্য-বুদ্ধ্যে যে অদ্বৈত গায
সেই সে বৈষ্ণব, জন্মে জন্মে কৃষ্ণ পায
वैष्णवाग्रगण्य-बुद्ध्ये ये अद्वैत गाय
सेइ से वैष्णव, जन्मे जन्मे कृष्ण पाय
 
 
अनुवाद
जो अद्वैत को सर्वोच्च वैष्णव मानकर उसकी महिमा करता है, वही सच्चा वैष्णव है। वह जन्म-जन्मान्तर में कृष्ण को प्राप्त करता है।
 
He who recognizes Advaita as the supreme Vaishnavism and glorifies it is a true Vaishnav. He attains Krishna in every birth.
तात्पर्य
सिर्फ़ वही वैष्णव कहलाते हैं जो श्री अद्वैत प्रभु की सभी वैष्णवों से श्रेष्ठ मानते हुए उनकी सेवा करते हैं। और जो श्री अद्वैत प्रभु को परम भोगी "कृष्ण" और श्री गौरासुंदर को अधीन भक्त मानते हैं, वे कभी भी कृष्ण के चरण कमलों को प्राप्त नहीं कर सकते। जो अद्वैत प्रभु को श्रेष्ठ वैष्णव मानते हैं, वे हर जन्म में कृष्ण की सेवा करने का अवसर पाएँगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)