श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  2.10.157 
যত যত শুন যার যতেক বডাঞি
চৈতন্যের সেবা হৈতে আর কিছু নাই
यत यत शुन यार यतेक बडाञि
चैतन्येर सेवा हैते आर किछु नाइ
 
 
अनुवाद
भक्तों के विषय में जो भी महिमा आप सुनते हैं, वह सब भगवान चैतन्य की सेवा के कारण है।
 
Whatever glories you hear about devotees are all due to their service to Lord Chaitanya.
तात्पर्य
किसी की महानता इस बात से तय होती है कि वह श्री चैतन्य की सेवा में कितना लगा हुआ है। श्री चैतन्य की सेवा के लिए व्यक्ति का लगाव ही उसकी ऊँची या नीची स्थिति को निर्धारित करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)