श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 155
 
 
श्लोक  2.10.155 
ভক্ত-রাজ অলঙ্কার,—ইহা নাহি জানে
অদ্বৈতের প্রভু—গৌরচন্দ্র নাহি মানে
भक्त-राज अलङ्कार,—इहा नाहि जाने
अद्वैतेर प्रभु—गौरचन्द्र नाहि माने
 
 
अनुवाद
वे यह नहीं जानते कि अद्वैत प्रभु भक्तों के आभूषण और राजा हैं। वे गौरचंद्र को अद्वैत का स्वामी नहीं मानते।
 
They do not know that Advaita Prabhu is the ornament and king of the devotees. They do not consider Gaurachandra to be the master of Advaita.
तात्पर्य
श्री चैतन्यदेव ईश्वर के सर्वोत्तम आकर्षक व्यक्तित्व हैं। श्री अद्वैत प्रभु श्री चैतन्य के आभूषण के समान हैं। इसको न समझकर अद्वैत के अनुयायियों के रूप में जाने जाने वाले लोगों में यह निंदा फैलाई गई, जिसमे श्री अद्वैत प्रभु को श्यामसुंदर और श्री गौरसुंदर को अद्वैत के अधीन माना गया, जो निश्चित रूप से भक्ति के राज्य से बहुत दूर है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)