श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 148
 
 
श्लोक  2.10.148 
শিরচ্ছেদিঽ ভক্তি যেন করে দশানন
না মানযে রঘুনাথ—শিবের কারণ
शिरच्छेदिऽ भक्ति येन करे दशानन
ना मानये रघुनाथ—शिवेर कारण
 
 
अनुवाद
दस सिर वाले रावण ने भक्तिपूर्वक शिव की पूजा की और रामचन्द्र का अनादर किया। परिणामस्वरूप, उसके सिर धड़ से अलग कर दिए गए।
 
The ten-headed Ravana devoutly worshipped Shiva and disrespected Ramachandra. As a result, his heads were severed.
तात्पर्य
दस सिरों वाला रावण "शिव का प्रसिद्ध भक्त" था | यद्यपि वह शिव का भक्त था, परन्तु वह शिव के आराध्य भगवान रामचन्द्र की सेवा नहीं करता था, बल्कि उसने रामचन्द्र की धर्मपत्नी सीता का हरण कर अपनी पाप वृत्ति को प्रदर्शित किया | रुद्र के उस दस सिरों वाले भक्त ने रामचन्द्र से द्वेष करने का पाप किया और इसी विकृत मानसिकता के कारण उसने अपने सारे सिर गवाँ दिए | रामचन्द्र ही शिव के मूल कारण और आराध्य भगवान हैं | चूँकि यह तथ्य रावण के दस सिरों में नहीं घुसा, इसलिए रुद्रदेव ने उसकी सेवा को वस्तुतः स्वीकार नहीं किया | जो भी भगवान शिव को सेवा द्वारा प्रसन्न करने में समर्थ होते हैं, वे मंगल प्राप्त करते हैं | लेकिन चूँकि रुद्र रावण द्वारा दी गई पूजा और सेवा से प्रसन्न नहीं हुए थे, इसलिए वह और उसका पूरा परिवार मारा गया | उसी तरह, चूँकि अद्वैत के वंशजों और उनके अनुयायियों की सेवा प्रवृत्ति गलत थी, वे विष्णु और वैष्णवों से द्वेष करने लगे और अतीबादियों की तरह वैष्णव समाज से सदा के लिए कट गए | अद्वैत के वे वंशज और उनके अनुयायी जो श्री चैतन्य की निन्दा करते हैं और अद्वैत प्रभु की श्री चैतन्य के प्रति सेवा प्रवृत्ति को नहीं समझ सकते, वे विष्णु की भक्ति सेवा के मंच पर नहीं रह सकते |

कुछ लोगों का कहना है कि वृकासुर को महादेव से यह वरदान मिला था कि जिसके भी सिर वो छूता है, वो भस्म हो जाता है | इस असुर ने रुद्र को तब परेशान किया जब रुद्र उसे मिले वरदान का प्रभाव परीक्षण करने गया और उसने पहले श्री रुद्र के सिर को छूआ | जब भगवान विष्णु के परामर्श से असुर ने वरदान की प्रभावशीलता का परीक्षण करने के लिए अपने सिर को छुआ, तो वह तुरंत नष्ट हो गया | चूँकि रावण, जो भगवान शिव का कट्टर भक्त था, इसी तरह की परिस्थितियों में गिर गया, इसलिए उसने भी, प्राकृत-सहजियाओं की तरह, शिव के आराध्य भगवान रामचन्द्र की सेवा करने के बजाए भक्ति सेवा की आड़ में भौतिक भोगों का स्वागत किया | यही रावण की शिव के प्रति अपनी सिर-काटने वाली भक्ति थी | चूँकि रावण ने रामचन्द्र से द्वेष किया और शिव की आराध्य देवी सीतादेवी की सेवा से विमुख हो गया, इसलिए उसके आराध्य भगवान शिव उससे अप्रसन्न हो गए | वे सभी अद्वैत वंशज और उनके तथाकथित वैष्णव अनुयायी जो श्री चैतन्य और उनके भक्तों से द्वेष बनाए रखते हुए अपनी भक्ति सेवा की विशेषज्ञता का प्रदर्शन करते हैं, वे भी ऐसी दयनीय स्थितियों में आते हैं |

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)