कुछ लोगों का कहना है कि वृकासुर को महादेव से यह वरदान मिला था कि जिसके भी सिर वो छूता है, वो भस्म हो जाता है | इस असुर ने रुद्र को तब परेशान किया जब रुद्र उसे मिले वरदान का प्रभाव परीक्षण करने गया और उसने पहले श्री रुद्र के सिर को छूआ | जब भगवान विष्णु के परामर्श से असुर ने वरदान की प्रभावशीलता का परीक्षण करने के लिए अपने सिर को छुआ, तो वह तुरंत नष्ट हो गया | चूँकि रावण, जो भगवान शिव का कट्टर भक्त था, इसी तरह की परिस्थितियों में गिर गया, इसलिए उसने भी, प्राकृत-सहजियाओं की तरह, शिव के आराध्य भगवान रामचन्द्र की सेवा करने के बजाए भक्ति सेवा की आड़ में भौतिक भोगों का स्वागत किया | यही रावण की शिव के प्रति अपनी सिर-काटने वाली भक्ति थी | चूँकि रावण ने रामचन्द्र से द्वेष किया और शिव की आराध्य देवी सीतादेवी की सेवा से विमुख हो गया, इसलिए उसके आराध्य भगवान शिव उससे अप्रसन्न हो गए | वे सभी अद्वैत वंशज और उनके तथाकथित वैष्णव अनुयायी जो श्री चैतन्य और उनके भक्तों से द्वेष बनाए रखते हुए अपनी भक्ति सेवा की विशेषज्ञता का प्रदर्शन करते हैं, वे भी ऐसी दयनीय स्थितियों में आते हैं |
