श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  2.10.147 
ঽসর্ব-প্রভু গৌরচন্দ্রঽ,—ইহা যে না লয
অক্ষয-অদ্বৈত-সেবা ব্যর্থ তাঽর হয
ऽसर्व-प्रभु गौरचन्द्रऽ,—इहा ये ना लय
अक्षय-अद्वैत-सेवा व्यर्थ ताऽर हय
 
 
अनुवाद
अद्वैत की अक्षय सेवा उस व्यक्ति के लिए व्यर्थ है जो यह स्वीकार नहीं करता कि, "गौरचन्द्र ही सबके स्वामी हैं।"
 
The eternal service of Advaita is useless for one who does not accept that "Gaurchandra is the master of all."
तात्पर्य
श्री अध्वैत प्रभु विष्णु तत्त्व हैं और भौतिक तत्त्वों के उपादान या मूलभूत कारण हैं। उनकी सेवा अविनाशी है। लेकिन अगर कोई अध्वैत के आराध्य प्रभु, श्री गौरासुंदर को सभी के आराध्य प्रभु के रूप में स्वीकार नहीं करता है और अध्वैत प्रभु को महाप्रभु के आराध्य प्रभु के रूप में मानकर अपराध करता है, तो अध्वैत प्रभु के लिए उसकी सारी सेवा निरर्थक हो जाती है। अध्वैत के घृणित तथाकथित सेवक कहते हैं कि चूँकि श्री गौर के भक्त महाप्रभु के प्रति निष्कपट भक्ति का गुण प्रदर्शित करते हैं, इसलिए वे अध्वैत की सेवा के विरोधी हैं। चैतन्य-चरितामृत (आदि 12.5, 7-10, 16, 66-74) में कहा गया है: "श्री चैतन्य महाप्रभु भी माली थे, और जैसे ही उन्होंने अपनी दया का पानी पेड़ पर डाला, दिन-ब-दिन सभी शाखाएँ और उपशाखाएँ बढ़ती गईं। जैसे-जैसे तना और शाखाओं को पानी मिलता गया, शाखाएँ और उपशाखाएँ खूब फैलती गईं, और पेड़ फलों और फूलों से भर गया। पहले अध्वैत आचार्य के सभी अनुयायी एक ही मत साझा करते थे। लेकिन बाद में उन्होंने दो अलग-अलग मतों का पालन किया, जैसा कि विधाता ने विधान किया था। शिष्यों में से कुछ ने आचार्य के आदेशों को कड़ाई से स्वीकार कर लिया, और अन्य विचलित हो गए, स्वतंत्र रूप से दैवी-माया के जादू के तहत अपनी राय बना ली। आध्यात्मिक जीवन में आध्यात्मिक गुरु का आदेश सक्रिय सिद्धांत है। जो कोई भी आध्यात्मिक गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करता है, वह तुरंत बेकार हो जाता है। "भगवान चैतन्य महाप्रभु चौदह लोकों के आध्यात्मिक गुरु हैं, लेकिन आप कहते हैं कि कोई और उनके आध्यात्मिक गुरु हैं। इसका समर्थन किसी भी प्रकट शास्त्र द्वारा नहीं किया गया है।' अध्वैत आचार्य की शाखा को मूल माली, श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा आपूर्ति किए गए पानी प्राप्त हुए। इस तरह, उपशाखाओं का पोषण किया गया, और उनके फल और फूलों का विकास हुआ। भगवान चैतन्य महाप्रभु के अंतर्धान के बाद, दुर्भाग्यपूर्ण कारणों से, कुछ शाखाएँ उनके मार्ग से भटक गईं। कुछ शाखाओं ने मूल तने को स्वीकार नहीं किया जिसने पूरे पेड़ को जीवंत और बनाए रखा। इस प्रकार जब वे कृतघ्न हो गए, तो मूल तना उन पर क्रोधित हुआ। इस तरह भगवान चैतन्य ने उन पर अपनी दया का पानी नहीं छिड़का, और वे धीरे-धीरे मुरझा गए और मर गए। कृष्णभावना रहित व्यक्ति सूखी लकड़ी या मृत शरीर से बेहतर नहीं है। उसे जीवित रहते हुए मृत समझा जाता है, और मृत्यु के बाद उसे यमराज द्वारा दंडित किया जाता है। न केवल अध्वैत आचार्य के गुमराह वंशज बल्कि जो कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ के खिलाफ है उसे यमराज द्वारा दंडित किए जाने वाले नास्तिक माना जाना चाहिए। वह चाहे कोई विद्वान विद्वान हो, कोई महान तपस्वी हो, एक सफल गृहस्थ हो या कोई प्रसिद्ध संन्यासी हो, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के पंथ के विरुद्ध है, वह यमराज द्वारा दी जाने वाली सज़ा को भुगतने के लिए नियत है। अध्वैत आचार्य के वंशज जिन्होंने श्री अच्युतानंद के मार्ग को स्वीकार किया, वे सभी महान भक्त थे। अध्वैत आचार्य की कृपा से, जो भक्त चैतन्य महाप्रभु के मार्ग का कड़ाई से पालन करते थे, उन्होंने बिना किसी कठिनाई के भगवान चैतन्य के चरण कमलों की शरण प्राप्त की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)