श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 146
 
 
श्लोक  2.10.146 
চৈতন্যেতে ঽমহা-মহেশ্বরঽ-বুদ্ধি যাঽর
সেই সে—অদ্বৈত-ভক্ত, অদ্বৈত—তাহার
चैतन्येते ऽमहा-महेश्वरऽ-बुद्धि याऽर
सेइ से—अद्वैत-भक्त, अद्वैत—ताहार
 
 
अनुवाद
जो कोई भी श्री चैतन्य को सभी नियन्ताओं का सर्वोच्च नियन्ता मानता है, वह अद्वैत का वास्तविक भक्त है, और अद्वैत उसी का है।
 
Whoever accepts Sri Chaitanya as the supreme controller of all controllers is a true devotee of Advaita, and Advaita belongs to him.
तात्पर्य
केवल वे ही जो श्री चैतन्यदेव को श्री अद्वैत आचार्य के श्री उपास्य भगवान के रूप में स्वीकार करते हैं, अद्वैत प्रभु के वास्तविक भक्त हैं। श्री अद्वैत प्रभु केवल उनकी सेवा स्वीकार करते हैं। और जो लोग श्री अद्वैत की सेवा करने के क्रम में अद्वैत को "विष्णु" और श्री चैतन्यचंद्र को श्री वृषभानु की पुत्री मानते हैं उन्हें कभी भी अद्वैत के वास्तविक अनुयायी के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। पचास साल पहले भी शांतिपुर गाँव में इस तरह के घृणित नए दर्शन का उपदेश दिया गया था। इस दर्शन का प्रचार कालाना में भी हुआ और इस दर्शन का पालन करके उस स्थान के निवासी नरक में चले गए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)