श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  2.10.110 
স্পর্শের কি দায, দেখিলেই হরিদাস
ছিণ্ডে সর্ব-জীবের অনাদি-কর্ম-পাশ
स्पर्शेर कि दाय, देखिलेइ हरिदास
छिण्डे सर्व-जीवेर अनादि-कर्म-पाश
 
 
अनुवाद
उनके स्पर्श की तो बात ही क्या, हरिदास के दर्शन मात्र से ही अनादि काल से चले आ रहे सारे बंधन कट जाते हैं।
 
Forget about his touch, just by seeing Haridas all the bonds that have existed since time immemorial are broken.
तात्पर्य
शास्त्रों के सार का मंथन करते हुए लेखक लिखते हैं: "वैष्णव को देखते ही, सौभाग्य जाग जाता है। जीव प्राणियों को कर्मों की डोरों से बांधकर रखते हैं जो कि अनादि काल से चले आ रहे कामनाओं के कारण होता है। अगर वे परम मुक्त हरिदास को देख लेंगे, तो सांसारिक सुख-सुविधाओं की प्यास नष्ट हो जाएगी और वे सभी अनर्थों या अवांछित चीज़ों से मुक्त हो जाएँगे। यदि केवल ऐसे व्यक्ति को देखने से ऐसा होता है, तो निश्चित तौर पर इसके स्पर्श से और भी अधिक शुभ की उम्मीद की जा सकती है। शास्त्रों में इसकी ज़ोरों से घोषणा की गई है। श्रील नरसिंह ठाकुर ने गाया है: गंगारा परस हइले पश्चात पवन, दर्शने पवित्र कर एइ तोमार गुण- "पवित्र गंगा नदी के पानी में कई बार स्नान करने से व्यक्ति पवित्र होता है, लेकिन सिर्फ तुम्हें देखने से ही पतित आत्माएं पवित्र हो जाती हैं। यह तुम्हारी महान शक्ति है।" श्रीमद् भागवतम में (1.1.14) कहा गया है कि:

आपन ह सँसृतिं घोर

यं नाम विवशो गृण

ततः सद्यो विमुच्येत

यद् बिभेति स्वयं भयं

"जीव जो जन्म और मृत्यु के जटिल जाल में उलझे हुए हैं, उनको भगवान कृष्ण का पवित्र नाम अवचेतन से भी जपने से तुरंत मुक्त किया जा सकता है, जो कि भय से डरता है।" श्रीमद् भागवतम में (1.19.33-34) कहा गया है कि:

येषां संसकरणात पुंसां

सद्यः शुद्ध्यंति वैं गृहाः

कि पुनः दर्शन-स्पर्श-

पाद-शौचाशनादिभिः

सान्निध्य ते महा-योगिन

पातकांनि महान्य अपि

सद्यो नश्यंति वै पुंसां

विष्णोर इव सुरेतराः

"बस तुम्हें याद करने से ही हमारे घर तुरंत पवित्र हो जाते हैं। और तुम्हें देखने, छूने, तुम्हारे पवित्र पैर धोने और तुम्हें अपने घर में बैठने की जगह देने की तो बात ही छोड़ो? जैसे नास्तिक भगवान के व्यक्तित्व की उपस्थिति में नहीं रह सकता है, उसी तरह पापी पुरुषों के अजेय पाप भी तुम्हारी उपस्थिति में तुरंत नष्ट हो जाते हैं, हे संत! हे महान रहस्यवादी!" श्रीमद् भागवतम में भी (10.48.31) कहा गया है कि:

न ह्य अमायनि तीर्थानि

ना देवा मृज्छिला-मया:

ते पुनांति उरु-कालेन

दर्शनद एव साधव:

"कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि पवित्र नदियों के साथ पवित्र स्थान हैं, या यह कि देवता पृथ्वी और पत्थर से बनी देवता रूपों में प्रकट होते हैं। लेकिन ये आत्मा को लंबे समय के बाद ही पवित्र करते हैं, जबकि संत व्यक्ति सिर्फ देखे जाने से ही पवित्र करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)