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श्लोक 2.10.110  |
স্পর্শের কি দায, দেখিলেই হরিদাস
ছিণ্ডে সর্ব-জীবের অনাদি-কর্ম-পাশ |
स्पर्शेर कि दाय, देखिलेइ हरिदास
छिण्डे सर्व-जीवेर अनादि-कर्म-पाश |
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| अनुवाद |
| उनके स्पर्श की तो बात ही क्या, हरिदास के दर्शन मात्र से ही अनादि काल से चले आ रहे सारे बंधन कट जाते हैं। |
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| Forget about his touch, just by seeing Haridas all the bonds that have existed since time immemorial are broken. |
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