आपन ह सँसृतिं घोर
यं नाम विवशो गृण
ततः सद्यो विमुच्येत
यद् बिभेति स्वयं भयं
"जीव जो जन्म और मृत्यु के जटिल जाल में उलझे हुए हैं, उनको भगवान कृष्ण का पवित्र नाम अवचेतन से भी जपने से तुरंत मुक्त किया जा सकता है, जो कि भय से डरता है।" श्रीमद् भागवतम में (1.19.33-34) कहा गया है कि:
येषां संसकरणात पुंसां
सद्यः शुद्ध्यंति वैं गृहाः
कि पुनः दर्शन-स्पर्श-
पाद-शौचाशनादिभिः
सान्निध्य ते महा-योगिन
पातकांनि महान्य अपि
सद्यो नश्यंति वै पुंसां
विष्णोर इव सुरेतराः
"बस तुम्हें याद करने से ही हमारे घर तुरंत पवित्र हो जाते हैं। और तुम्हें देखने, छूने, तुम्हारे पवित्र पैर धोने और तुम्हें अपने घर में बैठने की जगह देने की तो बात ही छोड़ो? जैसे नास्तिक भगवान के व्यक्तित्व की उपस्थिति में नहीं रह सकता है, उसी तरह पापी पुरुषों के अजेय पाप भी तुम्हारी उपस्थिति में तुरंत नष्ट हो जाते हैं, हे संत! हे महान रहस्यवादी!" श्रीमद् भागवतम में भी (10.48.31) कहा गया है कि:
न ह्य अमायनि तीर्थानि
ना देवा मृज्छिला-मया:
ते पुनांति उरु-कालेन
दर्शनद एव साधव:
"कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि पवित्र नदियों के साथ पवित्र स्थान हैं, या यह कि देवता पृथ्वी और पत्थर से बनी देवता रूपों में प्रकट होते हैं। लेकिन ये आत्मा को लंबे समय के बाद ही पवित्र करते हैं, जबकि संत व्यक्ति सिर्फ देखे जाने से ही पवित्र करते हैं।"
