श्री-भगीरथ उवाच
साधवो न्यासिनः शान्ता
ब्रह्मिष्ठा लोका-पावनाः
हरन्त्य घम ते अंग-संगात
तेष्व आस्ते ह्य घ-भिद्ध धरिः
"जो भक्ति भाव के कारण संत हैं और इसलिए वैरागी हैं, भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं और जो विशुद्ध भक्त हैं, वेदों में वर्णित नियमन सिद्धांतों का पालन करने में कुशल हैं, वे हमेशा गौरवशाली और अपने व्यवहार में पवित्र हैं और सभी पतित आत्माओं को मुक्ति दिलाने में सक्षम हैं। जब ऐसे शुद्ध भक्त आपके जल में स्नान करते हैं, तो अन्य लोगों से संचित पाप कर्मों का निश्चित रूप से प्रतिकार किया जाएगा, क्योंकि ऐसे भक्त हमेशा अपने दिल में भगवान को रखते हैं, जो सभी पाप कर्मों को जीत सकते हैं।"
