श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 10: भगवान के महाप्रकाश लीला का समापन  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.10.109 
হরিদাস-স্পর্শ বাঞ্ছা করে দেব-গণ
গঙ্গা ও বাঞ্ছেন হরিদাসের মজ্জন
हरिदास-स्पर्श वाञ्छा करे देव-गण
गङ्गा ओ वाञ्छेन हरिदासेर मज्जन
 
 
अनुवाद
देवता हरिदास का स्पर्श चाहते हैं और गंगा अपने जल में हरिदास के स्नान की प्रतीक्षा करती हैं।
 
The gods desire Haridas's touch and Ganga waits for Haridas to bathe in her waters.
तात्पर्य
गंगा जी, पतित आत्माओं की मुक्तिदात्री इच्छा करती हैं कि हरिदास उनके जल में स्नान करें। साधना की शक्ति के वर्णन में, भक्तों के चरणों की धूल और भक्तों के चरणों को धोने वाले पानी को सर्वोच्च कहा गया है। चैतन्य-चरितामृत (अंत्य १६.६०) में कहा गया है: "एक भक्त के चरणों की धूल, भक्त के चरणों को धोने वाला पानी और भक्त द्वारा छोड़े गए भोजन के अवशेष तीन बहुत शक्तिशाली पदार्थ हैं।" श्रीमद्भागवतम् (९.९.६) में कहा गया है:

श्री-भगीरथ उवाच

साधवो न्यासिनः शान्ता

ब्रह्मिष्ठा लोका-पावनाः

हरन्त्य घम ते अंग-संगात

तेष्व आस्ते ह्य घ-भिद्ध धरिः

"जो भक्ति भाव के कारण संत हैं और इसलिए वैरागी हैं, भौतिक इच्छाओं से मुक्त हैं और जो विशुद्ध भक्त हैं, वेदों में वर्णित नियमन सिद्धांतों का पालन करने में कुशल हैं, वे हमेशा गौरवशाली और अपने व्यवहार में पवित्र हैं और सभी पतित आत्माओं को मुक्ति दिलाने में सक्षम हैं। जब ऐसे शुद्ध भक्त आपके जल में स्नान करते हैं, तो अन्य लोगों से संचित पाप कर्मों का निश्चित रूप से प्रतिकार किया जाएगा, क्योंकि ऐसे भक्त हमेशा अपने दिल में भगवान को रखते हैं, जो सभी पाप कर्मों को जीत सकते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)