श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  2.1.95 
স্থির হৈ, ক্ষণেকে বসিলা বিশ্বম্ভর
তথাপি আনন্দ-ধারা বহে নিরন্তর
स्थिर है, क्षणेके वसिला विश्वम्भर
तथापि आनन्द-धारा वहे निरन्तर
 
 
अनुवाद
कुछ समय बाद विश्वम्भर शांत होकर बैठ गये, फिर भी उनके हृदय में प्रेम की धारा प्रवाहित होती रही।
 
After some time, Vishvambhar sat down quietly, yet the stream of love continued to flow in his heart.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)