श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  2.1.93 
আছাডের সমুচ্চয নাহিক শ্রী-অঙ্গে
না জানে ঠাকুর কিছু নিজ-প্রেম-রঙ্গে
आछाडेर समुच्चय नाहिक श्री-अङ्गे
ना जाने ठाकुर किछु निज-प्रेम-रङ्गे
 
 
अनुवाद
भगवान बार-बार जोर से जमीन पर गिरे, लेकिन प्रेमोन्मत्त होने के कारण उन्हें कुछ भी महसूस नहीं हुआ।
 
The Lord fell hard on the ground again and again, but being in ecstasy of love he did not feel anything.
तात्पर्य
कृष्ण के प्रेम से परम अभिभूत होकर भगवान बारम्बार भूमि पर गिर पड़ते थे परन्तु उनके परा-भौतिक शरीर पर किसी भी प्रकार की चोट के कोई चिन्ह नहीं होते थे। वे पूर्ण रूप से अपने अंतर्मुखी भाव में डूबे हुए थे, अतः बाहरी उल्लास या दुख का वे अनुभव ही नहीं करते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)