श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  2.1.84 
দেখিলেন মাত্র প্রভু ভাগবত-গণ
পডিতে লাগিলা শ্লোক ভক্তির লক্ষণ
देखिलेन मात्र प्रभु भागवत-गण
पडिते लागिला श्लोक भक्तिर लक्षण
 
 
अनुवाद
जैसे ही भगवान ने भक्तों को देखा, उन्होंने भक्ति की विशेषताओं का बखान करते हुए श्लोक सुनाना प्रारम्भ कर दिया।
 
As soon as the Lord saw the devotees, he started reciting verses describing the qualities of devotion.
तात्पर्य
शुक्लांबर के घर पर भक्तों की उत्सुकता देखने के बाद, जो भगवान कृष्ण के प्रेम से अभिभूत था, भगवान ने शुद्ध भक्ति सेवा की विशेषताओं का महिमामंडन करते हुए निम्नलिखित छंदों का पाठ किया।

सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परात्वेन निर्मलम्

हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते

“भक्ति, या भक्ति सेवा का अर्थ भगवान, सभी इन्द्रियों के स्वामी, भगवान के प्रति अपनी सभी इन्द्रियों को संलग्न करना है। जब आत्मा परम के लिए सेवा प्रदान करती है, तो इसके दो दुष्प्रभाव होते हैं। एक तो सभी भौतिक पदनामों से मुक्त हो जाता है, और केवल प्रभु की सेवा में नियोजित होने से, किसी की इंद्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं।’

अन्यभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्

आनुकूल्येन कृष्णानु-शीलनं भक्तिर उत्तमा

“किसी को भी परम भगवान कृष्ण की अनुकूलतापूर्वक और भौतिक लाभ की इच्छा के बिना या फलस्वरूप गतिविधियों या दार्शनिक अटकलों के माध्यम से लाभ की इच्छा के बिना प्रेममयी भक्ति सेवा प्रदान करनी चाहिए। इसे शुद्ध भक्ति सेवा कहा जाता है।” उन्होंने श्री माधवेंद्र पुरी द्वारा बोले गए निम्नलिखित श्लोक का भी पाठ किया, जो निम्नलिखित श्लोक 85 का आशय है: पाइनू, ईश्वर मोरा कोण दिके गेला? - "मैंने अपने प्रभु को प्राप्त किया, लेकिन हे, वे कहाँ गए?"

अयि दीना-दयाद्र नाथ हे

मथुरा-नाथ कदावलोक्यसे

हृदयं त्वद-अलोक-कतरं दयिता

भ्राम्यति किं करोमि अहम्

“हे मेरे स्वामी! हे सबसे दयालु स्वामी! हे मथुरा के स्वामी! मैं आपको फिर कब देखूंगा? आप को न देखने के कारण, मेरा उत्तेजित हृदय अस्थिर हो गया है। हे सबसे प्रिय, अब मैं क्या करूँ?" यह श्लोक प्रभु से अलग होने के भाव का संकेत देता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)