श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  2.1.76 
’তথাস্তু’ ’তথাস্তু’ বলে ভাগবত-গণ
ঽসবেই ভজুক কৃষ্ণচন্দ্রের চরণ’
’तथास्तु’ ’तथास्तु’ बले भागवत-गण
ऽसबेइ भजुक कृष्णचन्द्रेर चरण’
 
 
अनुवाद
सभी भक्त बार-बार यही कहते थे, "ऐसा ही हो। सभी लोग कृष्णचन्द्र के चरणकमलों की पूजा करें।"
 
All the devotees repeatedly said, "May it be so. Let everyone worship the lotus feet of Krishnachandra."
तात्पर्य
तथास्तु शब्द का प्रयोग स्मार्त अनुष्ठान में श्राद्ध समारोह में पितरों को तर्पण करते समय आशीर्वाद के तौर पर किया जाता है।

"ब्रह्मा से लेकर चींटी तक सभी कृष्ण के चरण कमलों की सेवा करें और इस तरह हमारे परिवार को बढ़ाएं।" श्रीवासा के मुँह से ये कथन सुनकर, सभी एकत्रित भक्तों ने तुरंत "तथास्तु" कहकर स्वीकृति दी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)