श्री चैतन्य भागवत  »  खण्ड 2: मध्य-खण्ड  »  अध्याय 1: भगवान के प्रतिष्ठान का प्रारंभ और कृष्ण-संकीर्तन पर निर्देश  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.1.54 
যতেক বৈষ্ণব তোলে তুলিতে না পারে
অক্ষয অব্যয পুষ্প সর্ব-ক্ষণ ধরে
यतेक वैष्णव तोले तुलिते ना पारे
अक्षय अव्यय पुष्प सर्व-क्षण धरे
 
 
अनुवाद
वैष्णव उस वृक्ष से अपनी इच्छानुसार जितने चाहें उतने फूल तोड़ लेते थे, लेकिन फूलों की आपूर्ति सदैव अक्षय और अखंड रहती थी।
 
Vaishnavas could pluck as many flowers as they wanted from that tree, but the supply of flowers always remained inexhaustible and uninterrupted.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)